कक्षा १०
आत्मत्राण - २
नमस्कार !
उम्मीद करती हूँ कल आपने आत्मत्राण कविता के प्रमुख बिंदु पढ़ लिए होंगे।
आज कविता पढ़िए व उसकी व्याख्या साहित्य कॉपी में लिखिए।
१. विपदाओं से मुझे बचाओ ,यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो (करुणामय)
कभी न विपदा में पाऊँ भय।
दुःख ताप से व्यथित चित को न दो सांत्वना नहीं सहीं
पर इतना होवे (करुणामय)
दुःख को मैं कर सकूँ सदा जय।
कोई कहीं सहायक न मिले,
तो अपना बल पौरुष न हिले,
हानि उठानी पड़े जगत में लाभ वंचना रही
तो भी मन में न मानूँ क्षय।।
शब्द-अर्थ
विपदाओं -मुश्किलों , करुणामय -दयावान , व्यथित -व्याकुल , चित्त-ह्रदय , बल-शक्ति , पौरुष -पराक्रम , वंचना-धोखा , क्षय -नाश , दुःखताप -कष्ट की पीड़ा।
व्याख्या
इन पंक्तियों में कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ईश्वर से कह रहे हैं कि दुखों से मुझे दूर
रखें ऐसी आपसे में प्रार्थना नही कर रहा हूँ बल्कि मैं चाहता हूँ आप मुझे उन
दुखों को झेलने की शक्ति दें। उन कष्टों के समय में, मैं भयभीत ना हूँ।वे
दुःख के समय में ईश्वर से सांत्वना नहीं बल्कि उन दुखों पर विजय पाने का
आत्मविश्वास और हौंसला चाहते हैं। कोई कहीं कष्ट में सहायता करने वाला
भी नही मिले फिर भी उनका पुरुषार्थ ना डगमगाए। अगर मुझे इस संसार में
हानि भी उठानी पड़े, कोई लाभ प्राप्त ना हो या धोखा ही खाना पड़े तब भी मेरा
मन दुखी ना हो। कभी भी मेरे मन की शक्ति का नाश ना हो।
निम्नलिखित प्रश्नो के उत्तर दीजिये :-
- कवि ने प्रस्तुत गीत किसे संबोधित करते हुए लिखा है ?
- कवि ईश्वर से क्या नहीं करने के लिए कह रहें हैं ?
- किसी सहायक के न मिलने पर कवि क्या चाहते हैं ?
- कवि ने पौरुष किसे माना है ?
- कविता में 'करुणामय' शब्द किसके लिए आया है ?
सीखे जाने वाले बिंदु (learning outcome) :-
- आत्म्त्राण कविता के माध्यम से मनुष्य को निरीह प्राणी बनने से रोकना।
- ईश्वर से समस्या -समाधान की याचना नहीं करना , बल्कि आत्मबल बढ़ाने की माँग करना।
- साहस के साथ आने वाली कठिनाईओं का सामना करने की प्रेरणा देना।
- आज रविंद्रनाथ की जन्म दिवस है, उनके रचे इस गीत को सुनकर उन्हें याद करते हैं https://youtu.be/r94gSTyH2cM
- ८.५.२०२० को आपकी बड़े भाई साहब से जुड़ी लघु परीक्षा होगी।
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